* विजय सिंह *
विगत दिनों एक नेता ने यह शगूफा छोड़ा कि राम भगवान नहीं थे ,वे राम को नहीं मानते ,नहीं जानते I इस कथन से क्या फर्क पड़ता है ? राजनीतिक रोटी सेंकने वालों के लिए तो ठीक है परन्तु आस्था ,आराध्य ,संस्कृति ,सभ्यता ,विश्वास और धर्म के दृष्टिकोण से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। राम को नहीं मानने का ढिंढोरा पीटने के बावजूद उन्होंने कहा कि राम ने शबरी के हाथों जूठे बेर खाए थे। हाँ ,खाए थे परन्तु अब वो शबरी कहाँ हैं ,जो उनके प्रभु को खट्टे बेर ना मिले ,इसलिए खुद पहले चखकर आश्वस्त होतीं ,तब उन्हें अर्पण करती। आज , सच में यदि राम को पाना चाहते हैं तो तलाश राम की नहीं शबरी की करनी होगी। याद कीजिये, शबरी माता को ,जिन्होंने अपने पिता तुल्य आश्रयदाता गुरु ऋषि मतंग द्वारा देह त्यागते समय कहे गए वचन कि" अब मेरे बाद तुम्हारा ख्याल राम ही रखेंगें और राम को खोजने की आवश्यकता नहीं ,वे स्वयं तुमसे मिलने आएंगे " को जीवन का मूल मंत्र बना लिया। भाव ,भक्ति,प्रेम और समर्पण का ऐसा रस घुला कि सचमुच एक दिन श्री राम शबरी माता की कुटिया में दौड़े चले आए। बेर की मिठास और माता के प्यार, स्नेह,भाव व भक्ति में ऊंच -नीच , जाति-धर्म ,जूठन का स्थान ही कहाँ बचा ? खोज शबरी की करनी होगी जो निश्छल स्नेह व भक्ति वश अपने राम से मिलने के लिए निस्वार्थ भाव से उनका इंतजार करती रहीं। यह शबरी माता का विश्वास ही था जिसने उनके आराध्य को भी उनकी कुटिया में स्वयं चल कर आने को विवश किया और जब राम उनकी कुटिया पधारे तो सांसारिकता का मोह त्याग मोक्ष का मार्ग चुना। कहां मिलेगी अब शबरी ? राम तो अब भी शबरी माता की कुटिया में दौड़े चले आने को आतुर हैं पर ढूंढना तो शबरी माता को है। हाँ ,इस राम नाम में असीम शक्ति है , फल दोनों पाते हैं ,जपने वाले और नहीं जपने वाले भी। राम को तो डाकू अंगुलिमाल भी नहीं मानते थे लेकिन राम की जगह सिर्फ मरा मरा बोलने से ही उनका उद्धार हो गया। राम तो सर्वत्र हैं ,हर जगह हैं ,कण कण में हैं ,हर प्राणी के भीतर हैं। कुंठित मन से तो राम को नहीं ढूंढ पायेंगें। जरूरत अपने अंदर बसे राम को पहचानने की है। जीतना है तो पहले खुद को जीतिए , प्यार और विश्वास से। जिस दिन आप खुद को जीत लेंगे ,दुनियादारी की जीत में भी, चाहे आप किसी भी पेशे में हों , अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर पायेंगें,लड़ने का साहस जुटा पाएंगे और जीत का मार्ग सुगम कर पाएंगे। तब फिर जम्हूरियत की गिनती के लिए किसी को राम को भगवान मानने और नहीं मानने का राग नहीं अलापना पड़ेगा। राम ने तो इंसान के रूप में अयोध्या के राजा दशरथ व महारानी कौशल्या के पुत्र बन धरती पर जन्म लिया था और इसी धरती पर वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए। अब जब अयोध्या है ,राजा दशरथ व महारानी कौशल्या थीं , राम कथा है तो फिर राम के अस्तित्व पर विवाद का प्रश्न ही नहीं। संत कबीर ने तो सच ही कहा है - " राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट । अंत काल पछतायेगा जब प्राण जाएंगे छूट।"
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