देश को आजाद हुए 75 साल हो गए लेकिन आज तक यह देश आजादी का मतलब नहीं समझ सका। सत्तारूढ़ दल को तो आजादी का कुछ पता होता भी है लेकिन सत्ता से पैदल दलों के मन की डाल पर तो आजादी की चिड़िया बैठती ही नहीं। चहचहाना तो दूर की बात है। आजकल ऐसा ही हो रहा है।हर साल स्वतंत्रता दिवस पर कुछ लोग अपने घरों पर पाकिस्तानी झंडा फहराते हैं। एक दिन पहले ही यूपी के एक जिले में एक व्यक्ति को अपने घर पर पाकिस्तानी झंडा फहराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।सहारनपुर में पकड़े गए आतंकी नदीम और राजस्थान में आईएसआई के लिए जासूसी करते पकड़े गए तीन देशद्रोहियों से तो तिरंगा लहराने की यह देश उम्मीद नहीं कर सकता।घृणा और द्वेष से भरा मिजाज बेहद खतरनाक होता है। देश में राष्ट्रभक्ति के भाव भरने का काम अनवरत होना चाहिए था लेकिन विपक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तिरंगा न फैलाने के आरोप लगाता रहा और अब तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी नागपुर मुख्यालय पर राष्ट्रध्वज फहरा दिया है। भाजयुमो ने कांग्रेस को आजादी का इतिहास पढ़ाने का संकल्प लिया है जिससे उसका यह मुगालता दूर हो जाए कि आजादी की जंग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान था या नहीं। आजादी सबके लिए होती है। वह व्यक्तिगत कम,सार्वजनिक ज्यादा होती है।स्वतंत्रता की सही व्याख्या तो तत्कालीन जनरल मानिक शाह भी नही कर सके थे। उन्होंने जाने अनजाने इसे फ्री यानी मुफ्त से जोड़ दिया था।आजकल मुफ्त की रेवड़ी पर बहस चल रही है। राजनीतिक दल और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर अलग-अलग विचार आए हैं।हम देश वासियों को यह समझना होगा कि मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता।हर मुफ्त कही जाने वाली सुविधाओं की यह देश बड़ी कीमत अदा करता है। एक कवि ने तो यहां तक लिखा है कि व्यक्ति ही नहीं,प्रकृति को भी श्रम का मूल्य चुकाना पड़ता है।श्रम का मूल्य चुकाना होगा,आज नहीं तो क्या कल है सुमन तुम्हें मुरझाना होगा।
देश आज अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है लेकिन हमें याद रखना होगा कि यह आजादी कितने संघर्षों,त्याग,तपस्या और बलिदानों की बिना पर मिली है। जो राष्ट्र समाज अपने अतीत को भूल जाता है,वह अपनी जड़ों से कट जाता है। यह अच्छी बात है कि भारत ने एक साल पहले से 14 अगस्त को भारत विभाजन की त्रासदी दिवस के रूप में मनाना शुरू किया है। जो देश अपनी गुलामी को भूल जाता है,वह आजादी के मार्ग से भी भटक जाता है।एक तिरंगा ही तो है तो विविध धर्मों,संप्रदायों,जातियों,उपजातियों,भाषाओं-संस्कृतियों,पूजा-पद्धतियों में बंटे और अनेकता में एकता का संदेश देते भारत राष्ट्र को एक कर सकता है। आजादी का यह मतलब हरगिज नहीं कि कुछ लोगों के फ्लैट और दीवारों से धन की ढेरियां निकले और कुछ लोग मुफ्त सरकारी अनाज पाने लिए घंटों तपती धूप में खड़े रहें। इस प्रवृत्ति पर अंकुश में ही आजादी का वास्तविक मर्म छिपा है। अपराधी अपराधी है लेकिन कुछ लोग उनकी आजादी के सवाल उठा रहे हैं।देश के दुश्मन चीन और पाकिस्तान में ही नहीं रहते,हमारे अपने बीच भी रहते हैं।ऐसे लोगों को पहचानना होगा।उनके मुखौटे उतारने होंगे तभी हम आजादी के नजदीक पहुंच पाएंगे।चीन अपने जासूसी जहाज के साथ श्रीलंका के बंदरगाह पर पहुंच रहा है। पाकिस्तानी पोत भी वहां पहुंच गया है। चीन और पाकिस्तान कभी भी विश्वसनीय पड़ोसी नहीं रहे।ऐसे में सतर्कता बरतकर ही यह देश अपनी आजादी की रक्षा कर सकता है।
आजादी का मतलब है दायित्व।तिरंगे के तीन रंग केसरिया जहां हमें उच्च बलिदान,उत्तम स्वास्थ्य,श्रेष्ठ पराक्रम की प्रेरणा देता है,वही बीच का सफेद रंग देशवासियों के धवल चरित्र,उज्ज्वल बेदाग कार्य संस्कृति का परिचायक है। इसका हरा रंग देश की प्रसन्नता,संपन्नता और प्रकृति संरक्षण का द्योतक है। काश,हम इस दिशा में सोच पाते।गुलामी और आजादी का फर्क समझ पाते।सबको साथ जोड़कर चल पाते।आजादी का त्योहार केवल प्रतीक नहीं है,यह अपने तरह की समवेत राष्ट्र साधना है।अपने साथ ही राष्ट को अभ्युदय के शिखर तक ले जाने की उद्दाम भावना है। देश सबको मौका देता है।हमें विचलित नहीं होना है।पथच्युत नहीं होना है। यह देश सबका है।इसलिए अधिकार नहीं,कर्तव्य को महत्व देना है।देश सर्वोपरि है,जब तक इस भाव भूमि के तहत काम नहीं होगा, हम आजादी के तत्व दर्शन से दूर ही रहेंगे। दूसरों को महत्व दिए बगैर खुद को समझना बेहद कठिन होता है। अपनी पीठ के बाल देखना किसी के लिए भी सम्भव नहीं।इसलिए गुलामी और आजादी को तौलें जरूर,तब पता चलेगा कि हमारे लिए इन दोनों में कौन अधिक वजनी है?कौन अधिक कीमती है?आजादी के अमृत और गुलामी के विष का फर्क हम अब नहीं तो कब समझेंगे।
--सियाराम पांडेय'शांत'--
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें